लॉक डाउन ने तोड़ दी सब्जी उत्पादकों की कमर,भाग्य को कोस रहा किसान.
रिपोर्ट:शिवकेशशुक्ल:
लागत निकलना हुआ नामुमकिन.
ईएमएस(अमेठी):जिस उम्मीद से किसानों नें सब्जी उत्पादन के लिए खेतों में अपना पसीना बहाया उस पर लॉक डाउन ने इस कदर तुषारापात किया कि सब्जी उत्पादकों की कमर ही टूट गयी। मुनाफे की बात छोड़ों लागत निकलना अब मुमकिन नहीं दिख रहा है।
मुसाफिरखाना में भददौर की तिराई को सब्जी उत्पादन के प्लेटफार्म के रूप में जाना जाता है। यहां लगभग सौ बीघे से भी अधिक भूमि पर सब्जी का उत्पादन होता है। प्रतिदिन औसतन एक ट्रक से अधिक सब्जी सैंकड़ों किसान तैयार करते और बेचते रहे हैं। कोविद-19 के लॉक डाउन की सबसे बड़ी मार इस बार सब्जी उत्पादकों पर पड़ी। लॉक डाउन के चलते जहाँ एक ओर शादी विवाह के कार्यक्रम रद्द होने से सब्जी की खपत में कमी आई वहीं तैयार सब्जियां मंडियों तक न पहुंच पाने के कारण खेतों में ही बर्बाद हो रही हैं।
सब्जी उत्पादक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले किसान तेज नारायण पांडेय का कहना है कि पहले हमारे क्षेत्र की सब्जियां प्रतिदिन अयोध्या, गोंडा, लखनऊ, रायबरेली, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ आदि जिलों की मंडियों तक जाती थी लेकिन अब पड़ोसी जनपद सुलतानपुर भी जाने में दिक्कतें हैं। सब्जी की बिक्री के लिए मात्र स्थानीय बाजार पर ही निर्भरता रह गयी है। स्थानीय सब्जी मंडी का यह हाल है कि रात बारह बजे तक मंडी सब्जी पहुंचना पड़ता है और तीन बजे से पहले वहां से निकलना पड़ता है। उस पर भी पुलिस की लाठी खाने का भय बना रहता है। किसान आढ़तियों के दर पर सब्जी गिराकर भाग रहा है। न मोल न भाव आढ़तिया जो बता दे बस वही तौल और भाव मिलना किसान की मज़बूरी है। कमोवेश कुछ ऐसी ही बातें दादरा गाँव के किसान राजमणि सिंह भी बताते हैं। खेतों में तैयार सब्जियां बर्बाद हो रही हैं। किसान को इस बात मुनाफा तो छोड़िए लागत भी निकलना मुमकिन नहीं दिख रहा है। भारतीय किसान संघ के जिलाध्यक्ष हरित सिंह कहते हैं कि मंडी जाने पर सब्जी उत्पादकों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ रही हैं। प्रशासन ने न तो सब्जी उत्पादकों का दर्द समझा और न ही उनकी की तैयार सब्जियों को मंडी तक पहुंचाने का मुकम्मल इंतजाम किया। अगर खेतों से सब्जियों की खरीद व्यवस्था प्रशासन करता तो किसानों को राहत मिल सकती थी।
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